शायरी......

अक्सर दिल में कई ख्याल उठते हैं, जो अनजान  सी कीसी गली से होके गुज़रते हैं. ऐसे ही कीसी  ख्याल को शब्दों की डोर पहना के पेश करता हूँ....


क्या समंदर भी कभी रोता होगा


क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे 
जब रेत बाँहों से फिसलती है उसकी... 
क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे 
जब सूरज हर रोज़ उसके सीने में पिघलता होगा,
क्या समंदर भी कभी रोता होगा 

यु तो बेहद मजबूर से है तेवर उसके,
पर क्या वो भी कभी टूटता होगा,
जैसे पिघलती है मोम आईने पे धीरे से 
हर कदम को सँभालते हुए,
जैसे हार रही हो हर चाल के साथ,
क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे 
अपनी लहरों को मचलते देख 
क्या समंदर भी कभी रोता होगा

किसी शायर की ग़ज़ल के जैसे जब कोई उसकी गहराई को छुटा है,
अपनी तन्हाई पे क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे... 
जैसे रुक गई हों ख्वाहिशें किसी मासूम की,
वो तक़दीर के खेल पे 
क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे 

कभी शाम को मैंने भी अपने गम समंदर में बहाएं हैं 
क्या उनको अपने पलकों में समेत के 
क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे 
सोचता होगा मेरी गहराई में दफन हैं राज़ कितने... 
क्या उन कहानियों को दोहरा के अपने जेहेन में 
क्या समंदर भी कभी रोता होगा, किसी किनारे

- Ashk


जुरत कर बैठ.....





आज तमनाओ को पर मीले,
तो उड़ने की जुरत कर बैठे...
सहमे से खड़े थे तेरे इंतज़ार में,
आज चलने की जुरत कर बैठे ...

यूँ तो महफ़िल में मुस्कराते थे हम,
तुझको देखा  तो रोने  की जुरत कर बैठे...
कहा तक छुपाते इन्हें ये भी तो बता,
तेरी बाँहों में पिघलने की ये भी जुरत कर बैठे....

जो देखा तुझको उसके कांधे पे सर टीकाते हुए,
न चाहते हुए भी तेरी ख़ुशी में मुस्कराने की जुरत कर बैठे....
अक्सर जो सुलझाई थी जुल्फे इन हाथों से हमने,
उन्ह उसके सीने पे बीख्री देख कर,
 कुछ और यादों को भुलाने की जुरत कर बैठे ....

जब मीलाया तुने उससे हमे,तेरे लब पे उसका नाम सुनके ,
उन होठों की नमी को भुलाने की जुरत कर बैठे ....
कहा जो उसने , आज मेरे आशीयाने में ही रुक जा ,
 तेरी बड़ी हुई सांसो को नाप कर , तेरी नादानी पे मुस्कुराने की जुरत कर बैठे ...

देख के मेरी आँखों की नमी को , जो नज़रें चुरा ली तुने ,
ये नज़रें झुका ली जो तुने ,
अपनी हर साँस तेरे नाम करने की जुरत कर बैठे,
तुझसे मोहबत करने की जुरत कर बैठे ......

-Ashk




 इस जहाँ में कही..... या उस जहाँ में कभी....




आज गर तू होता तो तुझको आगोश में भरकर लाखों कहानियां सुनाता,
हस्ता खिलखिलाकर तेरी चाहत में, और तू न होता गर पल भर भी साथ
तो तेरी याद में सहम जाता
तू आता मुस्कुराता हुआ,
मैं उस हँसी में पिघल के फिर से उन बचपन की गलियों में खो जाता !


तेरी कलाही को अपने हांथो में पकड़ कर बैठा रहता,

खेलता मैं तेरी जुल्फों से
वो सर्दी की रात में होठों से होठों को मिलाए हुए सोते हम रात भर
और सुबह मेरी होती तेरी खुशबू से



ऐ काश की तेरी हर नाराज़गी पे मैं मचल उठता

इतना लड़ता तुझसे की तू रो देती मेरे सामने
और फिर मैं तड़पता इस आग में की
मैंने जो किआ वो गलत किआ



वो डर की तू छोड़ के न चली जाए

तू अपने राज़ के खुले दरवाज़ों को डर के मुझसे बंद न कर दे
तू कही मुझसे इतना न रूठ जाए के फिर लौट के न आए
मैं आता तेरे पास तुझे मानाने
और रोते हम साथ उस रात
और इतने करीब आ जाते उस एक ही पल में
जी लेते हुए वो सारे पल जो रोये थे हम भूलने
हम बाँहों में बाहें दाल सो जाते...



सच कह रहा हु मैं बहुत परेशां करता तुझे

जाने न देता तुझे नज़रों से दूर एक पल भी
सच कहता हु मैं, बहुत प्यार करती तू मुझको
और उतनी ही नफरत भी
और उतनी ही चाहत मैं देता तुझको



अब ये न पूछ कहा मिलूंगा मैं तुझको फिर से

अब ये न पूछ क्या करूँगा अब मैं
बस यकीन ये रख की तस्वीर उस जहाँ की आज भी ज़िंदा है आँखों में मेरी
वक़्त आने दे तुझे फिर से वो झलक दिखाएंगे कभी



इस जहाँ में कही..... या उस जहाँ में कभी....

- Ashk



आज...



आज रोने का मन किया,
तो तेरे कांधे की याद आयी, ऐ दोस्त .....
आज ज़माने की भीड़ में 
एक साथी की खोज में था, 
तो तेरी आवाज़ याद आयी, 
मुझे बेहेन मेरी....

आज इस मोड़ पर किस रस्ते को चुनूँ,
ये समझ न सका ,
तो आपकी सम्झाहिश याद आयी, पापा...
आज ज़िन्दगी की दौड़ में 
थक के भी नींद नहीं आयी,
तो तेरे आंचल की छाव याद आयी,मेरी माँ....

आज फुर्सत से बैठा आइने के सामने,
तो किसी शायर की ये बात याद आयी....
है कितना मतलबी इन्सान,
अपनी परछाई से पूछो, कहा उसने,
मेरी भी तो याद तुझे अँधेरे में ही आयी......

-Ashk 



शब्द



जब रूह को तोड़ के मेरी
टुकरे यूँ हज़ार ले जाते हो,
ऐ जालिम इन शब्दों को क्यों छोड़ जाते हो??

इन्हें भी जला दिया करो मेरी सांसो के साथ,
कमसे कम तेरी याद को बयां करने का कोई जरिया तो न बचे....

तो फिर मैं शायद तेरी परछाई को किसी कोने में दिल के दफना सकूँ,
इस नियत से नहीं की तुझे भुलाना है मुझे,
बल्कि इस फितरत से की तुझे खुद का एक हिस्सा बनाना है तुझे....

तू तो मेरे शब्द मेरे होंठों में छोड़ जाती है,
ये कह के ये मेरी निशानी हैं,इसे संझोते रहो,
क्या बीतती है इस ASHK पे सोचा है?
ये श्याही बनके तेरे नगमे ज़माने को सुनाता रहता है,आशिक की तरह..
डर डर के बहाता है ये वो बीते पलों की प्रवाह,
कहीं कोई लहर इतनी न गहरी हो जाए,
की तेरी कोई याद,तेरी शक्शियत की कोई परछाई,
मुझसे पल भर को ही सही, पर जुदा न हो जाए....

तू जाती है तो मेरे शब्द क्यों नहीं ले जाती??
थक न जाये ये ASHK बहते बहते,
तू इसे हमेशा के लिए क्यों नहीं सुला जाती...

-Ashk



इन्तहा की हद क्या है





एक गुलाब को अपने होंठो की नमी पे सम्हालो,
पलकों को एक दूजे से मिला दो, 
सांसों को उसके खयालो में समां जाने दो...
अब उस पंखुड़ी को अपने से दूर करने की कोशिश करो,
पर आंख न खोलना,
होंठों लो एक दूजे से जुदा न करना,
सांसो की लए न बढ़ाना,
"वो लम्हा इन्तहा की हद है"

समंदर के किनारे बैठ के,
लहरों को पत्थर से टकराके भी गाते सुनो,
उस एक पल के लिए उसकी यादों को दूर जाने दो,
फिर जब वो लहर समंदर में कही खोने वाली हो,
उस लम्हा, उसका चेहरा आँखों में उतारो,
"वो पल इन्तहा की हद है"

एक शायर की शायरी पढो,
और फिर उसके शब्दों की गहराई उसी की जुबानी सुनो,
जिन शब्दों में उसकी रुदाली 
उसकी आँखों में झलक आये,
उन शब्दों में अपनी ज़िन्दगी के किसी पल को रख दो 
फिर उस पल की बेचैनी को जियो,
"ये इन्तहा की हद है"

किसी गवैये को वो गीत गाने को कहो,
जिससे वो अपने रूठे महबूब को मनाता हो,
फिर उस गीत में उन पंक्तियों में 
जहाँ उसने तारीफ की हो उनकी अदा की,
उस लम्हे में उनकी अदा को यद् करो,
"वो लम्हा इन्तहा की हद है"

एक सुबह सूरज के साथ उठो,
ठंडी हवा को सीने से लगाओ
खूब हसो, खूब खिलखिलाओ,
दिन भर हर किसी का दिल जीत जाओ,
और रात को इतना थक जाओ की जब सोने औ,
तो किसी ऐसे की चाहत पो,
जिसके सामने मुखौटा न लगाओ,
जब उसे न पाओ,
"वो आँखों की नमी इन्तहा की हद है"

बचपन का सबसे पसंदीदा खेल 
एक दिन बगीचे में बच्चो  के साथ खेल आओ,
कुछ पल की ख़ुशी उनसे हार के पाओ,
फिर जब ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल हो तो,
इन पलों को यद् करो,
"वो यादें इन्तहा की हद है"

हर लम्हा किसी को यादों में बसाओ,
फिर एकदम से यादों से रुसवा हो जाओ,
जो तलब सीने में जागेगी 
फिर यादो में समाने की,
"वो इन्तहा की हद है"

मैं और क्या समझाउं इन्तहा की हद तुम्हे,
कभी किसी को अपना मान लो, 
उस अपने पे अपनी हर ख़ुशी कुर्बान कर दो,
फिर जब वो मुस्कुराये,
तो दूर से उसकी हसी को देखो,
पर पास न जा पाओ,
किसी से सची मोहब्बत कर जाओ,
"वो इबादत इन्तहा की हद है"

-Ashk  

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